आर्टिकल 79 संसद को परिभाषित करता है संसद में राष्ट्रपति राज्यसभा और लोकसभा शामिल होते हैं संसद में कौन शामिल है इसका उल्लेख भी इसी आर्टिकल में देखने को मिलता है राष्ट्रपति संसद में शामिल है कैसे कारण क्या हो सकता है संसद कानून बनाती है लेकिन बिल राष्ट्रपति के पास जाता है और राष्ट्रपति सिग्नेचर के बिना वे बिल कानून नहीं बन सकती
आर्टिकल 99
राष्ट्रपति संसद के सभी सदस्यों को शपथ दिलाएंगे और के वरिष्ठ सदस्य मतलब है जो कई बार मेंबर बन चुका है जिसे विधि संबंधित बातें पता हो लोक सभा के अस्थाई अध्यक्ष बनाते हैं जो राष्ट्रपति द्वारा बनाया जाता है
इसे अंतरिम अध्यक्ष या Protum speakers फिर भी कहते हैं
स्थाई अध्यक्ष के दो काम होते हैं
लोकसभा के सदस्यों को शपथ दिला ना
तब तक पद पर रहना जब तक लोकसभा में नए सदस्य ना चुन लिए जाए
इसका उल्लेख हमारे संविधान में नहीं प्रोटेम स्पीकर शब्द का अध्यक्ष वरिष्ठ सदस्य ही हो इसका भी उल्लेख नहीं है यह तो हमें देखने को मिलता है कर्नाटक राज्यपाल वर्सेस वाला केस के मामले में
आर्टिकल 331 लोकसभा के चुनाव के बाद यदि कोई एंगलो इंडियन निर्वाचित होकर नहीं आया तो इस ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति किन्ही दो एंग्लो इंडियन कमेटी के सदस्यों को नॉमिनेट कर सकता है स्थिति यदि एंग्लो इंडियन सदस्य निर्वाचित होकर लोकसभा में ना आया हो तब यदि दोनों एंगलो इंडियन निर्वाचित होकर आ गए हैं तो
Nominate नहीं किया जाएगा यदि एक आ गया है तो दूसरा नॉमिनेट किया जाएगा यहां बहुत ही इंटरेस्ट की बात यह है कि आज तक 1952 से लेकर 2014 तक 16 लोकसभा इलेक्शन में भी निर्वाचित होकर नहीं आए हैं
यह राष्ट्रपति की स्व विवेक शक्ति नहीं है मंत्रिपरिषद की सलाह पर दो एंग्लो इंडियन को नॉमिनेट करता है यही व्यवस्था स्टेट विधानसभा में होती हैं एंग्लो इंडियन मामला कर्नाटक यह लोग भी मंत्री बन सकते हैं
चलिए दूसरे आर्टिकल की बात करते हैं
Article 366 एंग्लो इंडियन शब्द क्यों परिभाषित करता है ऐसे इंडियन जिनके दादा या पिता दोनों में से एक अंग्रेज हो और मां हिंदुस्तानी हो अनिवार्य रूप से उन से उत्पन्न संतान एंग्लो इंडियन होंगे आर्टिकल 366 इस बात का बहुत अच्छे से उल्लेख करता है
27 मई 2014 को मोदी के मंत्रिमंडल में शपथ ली गई जुलाई 2015 तक कोई एंग्लो इंडियन nominate नहीं हुए थे बाद में राष्ट्रपति द्वारा दो एंग्लो इंडियन नॉमिनेट किए गए
आर्टिकल 180 तीन के तहत
राष्ट्रपति राज्यसभा में 12 सदस्य को मनोनीत करेगा यह 12 सदस्य साहित्य कला विज्ञान व समाजसेवा में विशेषज्ञ होनी चाहिए यह विचार भी राष्ट्रपति स्व विवेक से नहीं करता मंत्रिमंडल जिन लोगों का नाम देगी यह वही होंगे वर्तमान में सचिन तेंदुलकर मैरीकॉम सदस्य हैं इनका बैकग्राउंड खेल से है लेकिन खेल भी तो इस प्रकार की कला है यह 12 सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में भाग नहीं लेते साथ ही यह एंग्लो इंडियन सरकार के विश्वास व सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव में भाग नहीं लेते
आर्टिकल 85
राष्ट्रपति संसद के अधिवेशन बुलाता है
ससावधान समाप्ति की घोषणा करेगा
राष्ट्रपति लोकसभा को भंग कर सकता है
और यह काम वह मंत्रिमंडल की सलाह पर करता है राष्ट्रपति 98% मंत्रिमंडल की सलाह लेती है संसद के अधिवेशन में भी लेकिन राष्ट्रपति स्वा विवेक से भी संसद के अधिवेशन को बुला सकता है स्थिति ऐसी मंत्रिपरिषद लोकसभा में बहुमत खो चुकी हो या खोने वाली हो वह जानते हैं कि यदि संसद का अधिवेशन बुलाया गया उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव जारी किया जा सकता है जब प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह मंत्रिमंडल में बहुमत साबित करने में सक्षम नहीं थे तब राष्ट्रपति ने लोकसभा को भंग करने की सिफारिश की थी राष्ट्रपति को संविधान की रक्षा का शपथ दिलाया जाते हैं देता है
आर्टिकल 86 राष्ट्रपति संसद के अधिवेशन को संबोधित करता है या सत्र को संबोधित करता है संसद को संदेश भेजने का भी अधिकार होता है संसद सत्र को स्थगित स्थगित करने में राष्ट्रपति की कोई भूमिका नहीं होती यह काम संसद अध्यक्ष करता है यह संबोधन में राष्ट्रपति का अभिभाषण मंत्री परिषद द्वारा तैयार किए जाते हैं
आर्टिकल 87
राष्ट्रपति संसद को संबोधित करते
भारत के प्रथम सत्र को राष्ट्रपति अनिवार्य रूप से संबोधित करते हैं लोकसभा चुनाव के बाद लोकसभा की पहली सत्र को ही राष्ट्रपति संबोधित करते हैं अनिवार्य रूप से और 3 साल के तीनों सत्र बजट सत्र मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र होते हैं
कहां पर रखी जाती है
संयुक्त अधिवेशन किस स्थिति में बुलाया जा सकता है चलिए देखते हैं संसद यानी कि लोकसभा और राज्यसभा यदि बिल राज्यसभा में पारित हो गया हो और लोकसभा में आकर के अटक गई हो 6 महीने हो गया कोई भी रिस्पांस लोकसभा से नहीं आ रहा है इस स्थिति में राष्ट्रपति संसद का संयुक्त अधिवेशन बुला सकते है
राष्ट्रपति को इनकी नियुक्ति करने की अनुशंसा एक समिति द्वारा की जाती है जिसमें प्रधानमंत्री होम मिनिस्टर लोकसभा में विपक्ष का नेता राज्यसभा में विपक्ष का नेता उपसभापति लोकसभा स्पीकर साथ ही राष्ट्रपति भी शामिल होता है
वह एससी एसटी आयोग की अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति करते
हैं
Ut के गवर्नर एडमिनिस्ट्रेटर के नियुक्ति करते हैं
Ut दिल्ली और पांडुचेरी के मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते हैं
वित्त आयोग का गठन कर सकते हैं राज्य भाषा आयोग की नियुक्ति भी इन्हीं के द्वारा की जाती है
आर्टिकल 111 आर्टिकल 123 संसद राष्ट्रपति के पास कोई बिल भेजा राष्ट्रपति उसने सिग्नेचर किया था वह कानून बन गया सिग्नेचर नहीं किया और पुनर्विचार के लिए भेज दिया और एक ऐसी conditions created हुआ कि वह न ही सिग्नेचर किया और ना ही पुनर्विचार के लिए भेजा ऐसे विधेयक राष्ट्रपति के पास पड़ा रहा इस स्थिति को वीटो कहलाती है यह veto भी तो कहते हैं
लेकिन स्थिति इस तरीके का होता गैर सरकारी सदस्यों के विधेयक के संबंध में अर्थात संसद का वह सदस्य जो मंत्री ना हो द्वारा प्रस्तुत विधेयक हो
दूसरा संसद से पारित हो गया राष्ट्रपति के पास गया उसी दौरान नया मंत्रिमंडल इस पर हस्ताक्षर न करने की सलाह दे तब राष्ट्रपति बिल पर हस्ताक्षर करने के लिए निश्चित अवधि नहीं है राष्ट्रपति कितना भी समय ले ले सकता है और वह तो हां भी नहीं कहता और ना ही ना कहता ऐसी स्थिति को भी बेटों कहते हैं
Article 111 जिसमें राष्ट्रपति द्वारा किसी भी विधेयक को स्वीकृति देने का उल्लेख करता है राष्ट्रपति के लिए कोई अवधि निर्धारित नहीं होता इसे राष्ट्रपति द्वारा पुनर्विचार के लिए भेज सकता है
veto का मतलब रोकना या निषेध अधिकार है या लेटिन भाषा के शब्द है और इस प्रकार का कोई शब्द संविधान में उल्लेख नहीं है
Veto
Qualified Veto
pocket Veto
suspensive Veto
absolute Veto
1.यह चार प्रकार के होते हैं चलिए एक-एक करके इन सभी का मतलब समझते हैं क्वालिफाइड veto
यानी संसद से बिल राष्ट्रपति के पास गया स्वीकृति के लिए लेकिन राष्ट्रपति ने स्वीकृति देने से मना कर दिया उसे दोबारा संसद को भेज दिया गया अब यदि संसद उस दिल पर दो तिहाई बहुमत से पास करता है तब ही राष्ट्रपति सिग्नेचर करेगा यही क्वालिफाइड बेटों कहलाता है अभी तक यह क्वालिफाइड बेटू भारत के राष्ट्रपति को प्राप्त नहीं है यूएसए के राष्ट्रपति द्वारा इसका प्रयोग किया गया
Absolute veto
जब संसद से कोई बिल राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है भेजा गया राष्ट्रपति ने सिग्नेचर यह स्वीकृति देने से मना कर दिया वह विधेयक वही रद्द हो जाती है अब कभी भी इसे कानून नहीं बनाया जा सकता इस प्रकार के विधेयक को दोबारा राष्ट्रपति पास नहीं के पास नहीं भेजा जा सकता इस स्थिति को एप्स लूट ली तो कहते हैं सामान्यता गैर यानी non-government सदस्यों द्वारा लाए गए विधेयक पर ऐसा होता है भारत के राष्ट्रपति को ऐप्सोल्युटली तो प्राप्त है एग्जांपल वेदों का दूसरी स्थिति
Suspensive veto
संसद में कोई विधेयक पेश की मैं समझता हूं यह विधेयक राष्ट्रपति के पास गया लेकिन राष्ट्रपति एक बार इसको पुनर्विचार के लिए दोबारा भेज दे तो इस स्थिति को सस्पेंसिव veto कहलाती है लेकिन संविधान संशोधन और धन विधेयक को छोड़कर संविधान संशोधन की प्रक्रिया का वर्णन आर्टिकल 368 में बखूबी देखने को मिलता है 24 वा संविधान संशोधन 1971 में इंदिरा के सरकार ने प्रावधान किया कि संविधान संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति अनिवार्य रूप से स्वीकृति देगा राष्ट्रपति धन विधेयक के मामले में इस वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता क्योंकि राष्ट्रपति इस Vidhayak को रोक सकता है यह स्वीकृति देने से मना कर सकता है परंतु संसद में पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता राष्ट्रपति इस बिल पर अपनी स्वीकृति दे देता है क्योंकि यह विधेयक संसद में राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही लाया गया है 2006 में जब कलाम भारत के राष्ट्रपति थे का प्रयोग किया गया था और भारत के राष्ट्रपति ko yeh प्राप्त हुआ था एग्जांपल हमें देखना है जया बच्चन की सदस्यता प्राप्त करने की स्थिति में
Jaya Bachchan versus Bharat Sangh Mamla
Pocket veto
संसद में कोई बिन रखी गई वहां से बायपास हुआ और राष्ट्रपति के पास गया आप राष्ट्रपति ना तो इस बिल को सहमति दे रहा और ना ही स्वीकृति दे रहा और ना ही पुनर्विचार के लिए दोबारा भेज रहा यह अधिकार राष्ट्रपति को आर्टिकल 111 को के तहत मिलता है आप बात आती है उदाहरण देखते हैं हम कैसे हैं इस स्थिति का प्रयोग सर्वप्रथम राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने 1986 भारतीय डाक संशोधन विधेयक के संबंध में किया था जब राजीव गांधी की सरकार ने विधायक को अधिकार या किसी भी पत्र को खोल कर देख सकता है
आर्टिकल 123 राष्ट्रपति को अध्यादेश या ऑर्डिनेंस जारी करने की शक्ति देता है स्थिति जब संसद सत्र नहीं चल रहा हो और राष्ट्रपति को लगी ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो रही है कि अभिलंब कार्यवाही आवश्यक है तब राष्ट्रपति ऑर्डिनेंस जारी कर सकता है और ऑर्डिनेंस का वही प्रभाव होगा जो संसद के किसी कानून का होता है आर्टिकल 123 इस बात का बखूबी उल्लेख करता है आर्टिकल 13 (3) के अधीन विधि कानून शब्द के अंतर्गत अध्यादेश भी आता है सुप्रीम कोर्ट में ऑर्डिनेंस को चैलेंज किया जा सकता है और सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि ऑर्डिनेंस हमारे मूल अधिकार का अतिक्रमण करता है to इस स्थिति main सुप्रीम कोर्ट ordinance ko रद्द कर सकता है इस ऑर्डिनेंस की अवधि 6 सप्ताह के लिए होती है राष्ट्रपति द्वारा लाया गया यह ऑर्डिनेंस मंत्रिपरिषद की सलाह पर होता है इसकी गणना जारी होने के डेट डेट से नहीं होता बल्कि आने वाला सत्र जैसे मानसून सत्र 16 जुलाई से शुरू हो रहा है तब ऑर्डनेंस की गणना 16 जुलाई से जारी होने के 6 सप्ताह होगा ना ही जारी होने की डेट से राष्ट्रपति द्वारा आदेश को किसी भी समय वापस किया जा सकता है इस पर कानून नहीं बना सकता स्थिति में भी ऑर्डिनेंस 6 सप्ताह बाद समाप्त हो जाता है
DC vandva व वर्सेस बिहार राज 1988 का मामला जिसमें डीसी बांध बजे है लो के प्रोफ़ेसर महाराष्ट्र राज्य में है बिहार राज्य बार-बार ऑर्डिनेंस जारी करता था इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा बार-बार ऑर्डिनेंस जारी करना धोखा है आप अध्यादेश राज्य नहीं ला सकते नहीं चला सकते
आज के लिए इतना ही आगे हम राष्ट्रपति के न्यायिक शक्तियों के बारे में चर्चा करेंगे तब तक आप अपना ध्यान रखें धन्यवाद





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